मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के आदेगांव में है दूसरी छोटी काशी

7 दिसम्बर को श्री भैरव अष्टमी भक्तों की लगेगी कतार

आदेगांव- धार्मिक स्थलों मे आदेगांव के  प्राचीनतम गढी किले के अंदर भगवान श्री कालभैरवनाथ स्वामी का भव्य मंदिर ऐतिहासिक दृष्टि से  मराठा शासन काल मे निर्मित आदेगांव का यह किला जहा प्रतिवर्ष कालभैरव अष्टमी में आसपास समूचे क्षेत्र सहित अनेको जिलो से भी भक्तो का अपार जनसमुदाय एकत्रित होकर भगवान श्री के दर्शन का पुण्य लाभ संचित करता है ।        

    विदित हो कि अठारहवीं शताब्दी में मराठा शासनकाल में सैनिकों के लिए ऊंचे पहाड़ पर बनवाया गया आदेगांव का बुलंद किला आज भी क्षेत्र की पहचान है।  किले के निर्माण की नींव नागपुर के मराठा शासक रघुजी भोंसले के शासन काल मे रखी गई थी, 18वी शताब्दी ई.मे उनके गुरू श्री नर्मदा भारती   दीवान खड़क भारती गोंसाई ने आदेगांव की दुर्गम पहाड़ी पर इस विशाल परकोटे के रूप मे किले के लिए डाली थी ।इन्हैं भौसलें राज्य शासन ने 84 गांवों की जागीर प्रदान की थी ।  उन्हीं के द्वारा इस गढी प्राचीर के अंदर काल भैरव मंदिर का निर्माण किया गया था ।श्री नर्मदा भारती (खडकू भारती गोसांई) से यह किला शिष्य परंपरानुसार भैरव भारती , धोकल भारती , तथा दौलत भारती को मिला तदोपरांत इन्ही से ब्रिटिश शासन ने अपने अधिपत्य मे लिया था । ईट , पत्थर व चूना- लाल मिट्टी, बेलफलों की गोंद से निर्मित  किले की बाहरी दीवारें आज भी मजबूती के साथ अडिग होकर खड़ी हुई है । सदियां व्यतीत हो जाने के बाद भी इस किले की उंची चाहर दिवालें तथा बुर्ज महफूज है।एक दशक पहले पुरातत्व विभाग द्वारा किले के अंदर खुदाई कराई थी। इस दौरान यहां कक्ष, बरामदे व अन्य संरचनाएं होने के सबूत भी  मिले थे। बाद में खुदाई कार्य बंद कर दिया गया। इसके आंतरिक महल ध्वस्त हो चुके है ।किले में भगवान काल भैरव भगवान का पूर्वाभिमुख प्राचीन मंदिर है, जो लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इस किले को देखने आज भी दूर-दूर से लोग आदेगांव पहुंचते हैं। किले के पिछले हिस्से में बड़ा तालाब भी मौजूद है।     यह स्ममारक म.प्र .प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्वीय स्थलतथा अवशेष अधिनियम 1964(1964 के -3) के अंतर्गत राजकीय महत्व का भी  घोषित किया गया है ।

          किले की ऊंची दीवारें चारों ओर करीब तीन साढे तीन एकड़ में फैली हुई है। इसका मुख्य द्वार पूर्व मुखी है जबकि दूसरा दरवाजा पश्चिम की तरफ खुलता है।       हथियारों व सैनिकों के लिए आदेगांव में किले का निर्माण कराया गया था। इस किले का आंतरिक महल अब ध्वस्त हो चुका है। एक दशक पहले पुरातत्व विभाग द्वारा किले के अंदर खुदाई कराई थी। इस दौरान यहां कक्ष, बरामदे व अन्य संरचनाएं होने के सबूत मिले थे। बाद में खुदाई कार्य बंद कर दिया गया।

दूसरी काशी के नाम से प्रसिद्ध है किले का भैरव मंदिर

किले में विराजमान कालभैरव, नागभैरव व बटुकभैरव का पूजन सदियों से होता आ रहा है। लोग इसे दूसरा काशी के नाम से भी जानते हैं। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि बनारस (काशी) की तरह यहां पर भगवान कालभैरव की खड़े स्वरूप में प्राचीन प्रतिमा स्थापित है। यहां पर भैरव अष्टमी बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है।

श्यामलता का दुर्लभ वृक्ष

 किले के पिछले हिस्से में तालाब के नजदीक श्यामलता का विशाल वृक्ष है। कहा जाता है कि दुर्लभ श्यामलता के वृक्ष की पत्तियों में श्रीराधा कृष्ण का नाम लिखा दिखाई देता है। वृक्ष कब और किसने लगाया यह आज भी लोगों के लिए रहस्य की बात है।  जानकारों के अनुसार उक्त वृक्ष का महत्व इसलिए और अधिक माना जाता है कि श्यामलता के साथ चम्पू का वृक्ष भी साथ है व शास्त्रों के अनुसार श्यामलता में भगवान श्री कृष्ण व चम्पू के वृक्ष में राधारानी का वास होता है और इन दोनो वृक्षो का संगम देश मे विरले ही स्थानों पे देखा गया है ।

  18वीं शताब्दी में बनेआदेगांव के किले व गढ़ी का इस्तेमाल सैनिकों की छावनी के रूप में किया जाता था। यहां पर सैनिकों का दल विश्राम के लिए ठहरता था। सैन्य शक्ति को बढ़ाने और मजबूत करने के लिए मराठा शासकों ने इस बुलंद किले का निर्माण कराया था। आदेगांव का किला आज भी इतिहास की धरोहर है। इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने में भले ही शासन प्रशासन मूकदर्शी बना हो लेकिन यह एक दार्शनिक स्थल के रूप में आसपास समूचे क्षेत्र में प्रसिध्द है।
भैरव अष्टमी में प्रातः से देर रात्रि तक भक्तो का समुदाय बाबा श्री के दर्शनों हेतु लंबी कतार में लगा रहता है , बाबा के जन्मोत्सव की तैयारियां कालभैरव सेवा समिति द्वारा अंतिम चरण में जारी यही तो वही स्थानीय थाना प्रभारी ईश्वरी पटले सहित पुलिस प्रशासन भी शांति शुरक्षा व्यवस्था हेतु पूर्णता सजग व सक्रीय है।