मध्यप्रदेश में तिकड़ी में टकराव की आहट


राकेश अचल@ । मध्यप्रदेश में 14 महीने पहले महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया की मदद से मुख्यमंत्री बने शिवराज सिंह चौहान और उनके निकट साथी केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की तिकड़ी में टकराव की खबरें छन-छनकर आने लगी हैं. कॉरोनकाल में ये टकराव अब तक सतह के नीचे था किन्तु अब ये टकराव सतह के ऊपर दिखाई देने लगा है .
मध्यप्रदेश में सत्ता के सूत्र कहने को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथों में हैं किन्तु केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच सत्ता संघर्ष चलता रहता है. तोमर ,मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निकटस्थ सहयोगी रहे हैं .दोनों के बीच का तालमेल असंदिग्ध है लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया ,चौहान और तोमर के साथ 14 महीने पहले आये हैं .चूंकि मध्यप्रदेश में इस बार हारी हुई भाजपा के दोबारा सत्ता में लेन के सूत्रधार सिंधिया हैं इसलिए वे अपने हिस्से का एक पौंड गोश्त वसूलते रहना चाहते हैं .
भाजपा ने सिंधिया को हालांकि राज्य सभा में पहुंचा दिया है किन्तु अभी तक केंद्र में मंत्री नहीं बनाया है.ऐसे में सिंधिया प्रदेश में अपने हिस्से की सत्ता चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने हाथ-पांव चलाना भी शुरू कर दिया है .सिंधिया कहने को राज्य सभा सदस्य हैं किन्तु वे प्रदेश में एक मंत्री की हैसियत से ही काम करते नजर आते हैं. प्रदेश मंत्रिमंडल में उनके एक दर्जन से अधिक साथी मंत्री हैं जो पूरे प्रदेश में उनके लिए रेड कारपेड बिछाते हुए चलते हैं .सिंधिया प्रदेश में ग्वालियर के अलावा दूसरे अंचलों में भी एक मंत्री की हैसियत से बैठकों को समबोधित करते दिखाई देते हैं .
खबर है कि हाल ही में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सिंधिया और तोमर ने प्रशासनिक अधिकारियों को अलग-अलग निर्देश दिए.यहां तक की सिंधिया ने मुख्यमंत्री जी भी बात काटी .इस सरकारी बैठक के वीडियो वायरल हुए तो भाजपा और संघ के पदाधिकारियों को बड़ा नागवार गुजरा ,खुद मुख्य्मंत्री चौहान के लिए भी बड़ी विषम स्थिति बन गयी है .वे इसे न निगल पा रहे हैं और न ही उगल पा रहे हैं .दोनों नेताओं के अलग-अलग निर्देशों के कारण प्रशासन भी पशोपेश में है कि किसकी बात माने और किसकी नहीं.
राजधानी भोपाल में भी एक नामी निजी अस्पताल में आयुष्मान कार्ड स्वीकार न करने के मामले में भी मुख्यमंत्री से पहले सिंधिया ने दखल दिया और एक मरीज के परिजनों को राहत दिलाई .हालाँकि ये अस्पताल मुख्यमंत्री के एक भरोसेमंद आदमी का है. सरकार को मजबूरी में अस्पताल प्रबंधन को नोटिस जारी करना पड़ा .कहने का मतलब ये है कि सिंधिया को जहाँ-जहाँ उचित लग रहा है वे राजकाज में दखल दे रहे हैं और बेझिझक दे रहे हैं .सिंधिया समर्थक एक मंत्री के बेटे के खिलाफ कोरोना के इंजेक्शन कालाबाजरी करने के आरोप लगे किन्तु मुख्यमंत्री कुछ बोल ही नहीं पाए .
उल्लेखनीय है कि प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हाल ही में दमोह उपचुनाव हारने के बाद पहले से दबाब में हैं और अब ऊपर से सिंधिया की दखलंदाजी ने उनकी नींद हराम कर दी है .बंगाल विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की मध्यप्रदेश वापसी भी मुख्यमंत्री के लिए तनाव का कारण बनता जा रहा है. विजयवर्गीय भी मालवा अंचल में अपनी समानांतर सरकार चलने के प्रयास करते रहते हैं .कैलाश विजयवर्गीय पार्टी में चौहान के प्रमुख प्रतिद्वंदी हैं और अभी तक उन्होंने मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का सपना देखना बंद नहीं किया है.
आने वाले दिनों में भाजपा के भीतर चल रही इस तनातनी के परिणाम सामने देखने को मिल सकते हैं .मुमकिन है कि दबाब में भाजपा को शिवराज सिंह चौहान को चलता करना पड़े .चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बनाये गए हैं, वे संघ और पार्टी दोनों को पसंद हैं .चौहान ने कॉरोनकाल में भले ही कोई खासी उपलब्धि हासिल नहीं की है लेकिन उन्होंने इस दौरान अनेक लोक-लुभावन फैसले लेकर जनता की सहानुभूति बनाये रखने में कामयाबी हासिल की है .प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वे ‘यस मैन’ वे बहुत पहले से हैं शायद इसी वजह से अभी तक सिंधिया और कैलाश विजयवर्गीय के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए हैं ,लेकिन कल क्या होगा,कोई नहीं जानता ?


पिछ्ला लोकसभा चुनाव हारने के बाद सिंधिया ने अपनी पराजय का बदला कांग्रेस की अच्छी-भली चल रही सरकार का तख्ता पलटवाकर लिया था .इस तख्ता पलट के बावजूद भाजपा ने उन्हें उतनी तरजीह नहीं दी है जितनी कि वे अपेक्षा करते हैं .मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का निजी रूप से सिंधिया के साथ बेहतर तालमेल है किन्तु अब नरेंद्र सिंह तोमर और कैलाश विजयवर्गीय की सक्रियता के बाद इस समन्वय को कायम रखना टेढ़ी खीर दिखाई दे रहा है.वैसे भी एक मियाँ में जब दो तलवारें नहीं रखी जा सकतीं तब तीन तलवारों को रखना एक तरह से नामुमकिन है .कॉरोनकाल में सिंधिया ने कोरोना पीड़ित प्रेस और पार्टी कार्यकर्ताओं को सीधे संपर्क कर भी अपनी छवि बदलने की कोशिश की है .
लगभग सवा साल बाद भी भाजपा के तमाम नेता और कार्यकर्ता ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने परिवार का सदस्य स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हैं ,हालांकि सिंधिया ने अपना तमाम दर्प छिपकर भाजपा का एक आम कार्यकर्ता बनने की कोशिश की है .अब सिंधिया के सामने अपने लिए जगह बनाये रखने के साथ ही अपने बालिग़ हो चुके बेटे महाआर्यमन सिंधिया के लिए भी जमीन तलाशना है. यदि राज्य सरकार उनके मनमाफिक नहीं चलती तो उन्हें कठिनाई का समाना कर पड़ सकता है .इस समय ये चुनौती मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर के सामने भी है.कैलाश विजयवर्गीय तो अपने बेटे को विधायक बनवाकर बेफिक्र हो चुके हैं .
मध्यप्रदेश की राजनीति कॉरोनकाल में कौन सी करवट बैठती है ये अभी से कहना बहुत कठिन है,किन्तु ये आसानी से कहा जा सकता कि त्रयी में टकराव के आसार दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं ,कांग्रेस इससे मन ही मन खुश हो सकती है लेकिन उसे इसका बहुत लाभ मिलने वाला नहीं है.
@ राकेश अचल ( लेखक जाानेमाने वरिष्ठ पत्रकार हैै।)